कोल इंडिया में मेरे अनुभव


कोल इंडिया में मेरे अनुभव
जसविंदर पाल सिंह
निदेशक (संचालन), एमसीएल 

मैं बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौकीन रहा हूँ । कोल उद्योग में चार दशकों के अनुभवों में मैंने यही सीखा कि किसी भी उपक्रम की उत्पादकता तथा अंदुरुनी स्वास्थ्य उसमें कार्यरत लोगों की स्वेच्छा एवं अंत:प्रेरणा पर निर्भर करता है। किसी भी उपक्रम को अगर आप सभी संसाधन उपलब्ध भी करवा दें और अगर मानव संसाधन विकसित एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में नहीं है, तो शीघ्र ही सभी संसाधन नष्ट हो जाएँगे। इसलिए मैंने कुछ कटिंग्स अपनी डायरी में रखी थी अथवा प्रबंधन की कुछ किताबों में अंडरलाइन किया था, उन सभी को जोड़कर एक आलेख के रूप में आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता हूँ। उम्मीद है यह आलेख आपको अवश्य पसंद आएगा और मेरे व्यक्तिगत अनुभव आपके प्रोफेशनल जीवन में कहीं न कहीं मार्गदर्शन भी कर सकते हैं। इतना ही कह सकता हूँ कि चार दशकों की दीर्घ अवधि का यह निचोड़ है, अतः उन्हें अवश्य अमल में लाएँ।

प्रबंधन गुरु पीटर ड्रकर ने कहा है कि आधुनिक व्यसाय के भूमंडलीकरण, बदलती तकनीकियाँ, श्रमिक शक्ति के बदलते पहलू, खुले आर्थिक उदारीकरण के इस लोकतांत्रिक युग में भय से प्रेरित हो कर किसी भी कार्य का क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता है एवं आधुनिक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अंत:प्रेरणा से युक्त मैनेजरों का रखना अत्यंत जरूरी है ताकि निर्धारित लक्ष्य हासिल किए जा सके।
सेवा-निवृत बिग्रेडियर श्री ए. त्यागराजन का मानना है कि उच्च अनुसाशित सेना अपनी स्वप्रेरणा के लिये विश्व विख्यात है लेकिन उसमें भी अंत:प्रेरणा का विकास करना पड़ता है तथा  तत्पश्चात उसे बरकरार रखने की जरूरत होती है।
हावर्ड के प्रोफेसर विलियम जेम्स के अनुसार एक औसत व्यक्ति अपनी कुल मानसिक योग्यता का केवल दस प्रतिशत भाग ही प्रयोग में लाता है। नैतिक एवं बदलते मानवीय मूल्यों के इस दौर में इस योग्यता का इस्तेमाल और कम हो जाता है।
कोल इंडिया के पास लगभग 4-लाख मानव संसाधन है जोकि माइन्स एक्ट के तहत कार्यरत हैं तथा विभिन्न ट्रेड यूनियनों  द्वारा संचालित है। आज जहाँ कोयले की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं विभिन्न विभाग जैसे- खनन, सिविल, कार्मिक, परियोजना-नियंत्रण इत्यादि के लिए निपुण मानव संसाधन की जरूरत है ताकि हमारी कम्पनी का नाम विश्व-स्तर पर रोशन हो सके तथा हम लोग-हमारी शक्ति के नारे को सफलीभूत होते देखकर गौरवान्वित अनुभव कर सकें कि हम भी इस उपक्रम के एक सर्वश्रेष्ठ अंग है।
एमसीएल में मेरे अनुभवों के आधार पर मानव संसाधन के क्षेत्र में मानसिक एवं शारीरिक उन्नयन एवं प्रोत्साहन के लिये निम्न कदम उठाये जाने चाहिए--
1.       किसी भी अधिकारी के कथनी व करनी में विभेद न हो-
कई बार तो ऐसा लगता है कि "गुणवत्ता के लिये सतत प्रयासशील",खर्च पर नियंत्रण, नवीन विचार इत्यादि उक्तियाँ अयुक्तिसंगत प्रतीत होती हैं। क्योंकि मैंने देखा कि उन चीजों को अमलीजामा पहनाने वाले प्रबंधकों की कथनी व करनी में काफी अंतर होता है।
2.       अस्पष्ट उद्देश्य एवं दायित्वों का निर्वहन-
कई बार लोग दिये गये निदेशों को समझने में भूल कर देते हैं। मुझे लगा आपने ऐसा कहा था या ओह, मैं नहीं जानता था आप यह चाहते हैं। ऐसी बातें अक्सर सुनने को मिलती है। किसी एक संक्रिया को विभिन्न विभाग नियंत्रित करते हैं, जहाँ कर्तव्य एवं दायित्व में कोई विशिष्ट अंतर नहीं होता है, वहाँ अक्सर दायित्व का निर्वहन अस्पष्ट-सा हो जाता है। उदाहरण के तौर पर जब किसी अधिकारी के विरुद्ध चार्जशीट अथवा निलंबन का आदेश पारित किया जाता है, जिसमें लिखे आरोप पढ़ने से ऐसा लगता है कि कई अन्य विभाग भी इसके लिये दायी है, तो सम्पूर्ण आरोप उनके मत्थे मढ़ दिया जाता है?
यही बात ध्यान में रखते हुए उद्देश्य एवं दायित्व का वर्गीकरण स्पष्ट तौर पर होना चाहिए ताकि मानव संस्थान सुरक्षित अनुभव करें।
3.       विरोधाभासी प्राथमिकता:
हमारे उपक्रम में कई प्राथमिकताँ ऐसी हैं, जो परस्पर विरोधाभासी है। उदाहरण के तौर पर अगर इस माह आप गुणवत्ता पखवाड़ा मनाते हैं, तो आपके उत्पादन पर कुछ असर पड़ने लगता है, और अगर आप उत्पादन पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तो गुणवत्ता में कभी आना स्वाभाविक है। ठीक उसी प्रकार सुरक्षा के पहलुओं पर विशेष ध्यान दें तो उत्पादन के क्षेत्र में ह्रास होना लाजिमी है। अत: इन विभागों से संबंध रखने वालों के बीच आपसी विरोधाभास की झलक स्पष्ट दिखने लगती है अत: प्राथमिकता के वैज्ञानिक एवं तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मानदण्ड अवश्य तैयार किया जाना चाहिए।
4.       अपारदर्शिता:
बातों को छुपाने से लोगों का भरोसा कम होता है। यही नहीं, छुपाई गई बातें ज्यादातर सामने आ ही जाती है, वह भी गलत और विकृत रूपों में। इसलिये अच्छा यही है कम से कम बातों का राज रखा जाए। अगर कोई निर्णय लिया जाए तो तुरंत उसकी घोषणा कर दें, इससे पहले कि वह लोगों में कानाफूसी के जरिये पहुँचें।
कई बार मानव-शक्ति बजट तथा तदंनुरूप योजना-निरूपण की बात उठती है तथा उसके लिए लघु एवं दीर्घकालीन अवधि भी निर्धारित कर ली जाती है। परन्तु होने को क्या? वही ढाक के तीन पात, जिसमें कामगारों के मन में विद्वेंष, घृणा एवं सौतेलेपन की भावना का संचार होने लगता है। अत: मानव संसाधन के विकास हेतु तंत्र का पारदर्शी होना अत्यंत जरूरी है।
5.       पक्षपातपूर्ण रवैया न अपनाये, सबका उत्साह बढ़ाएँ --
अगर दफ्तर में कुछ लोग बॉंस से बहुत घनिष्ठ और दोस्ताना संबंध रखते हैं तो अन्य लोगों को इससे बहुत कष्ट होता है। इस सबसे दफ्तर का वातावरण खराब होता है। बॉंस को सभी लोगों से समान व्यवहार करना चाहिए। तरक्की उसी को मिलनी चाहिए, जो सबसे योग्य हो।
अरे, इसको क्या है? बॉंस का खास है, साथ में गाड़ियों में घूमता है तथा मजे उड़ाता है और करना कुछ भी नहीं।
इसको बॉंस कुछ भी नही बोलेंगे, जानते हो बॉंस के घर आना-जाना है इत्यादि-इत्यादि। इस प्रकार किसी नेता, बदमाश अथवा पहुँच वाले आदमियों को जब अनुचित ढंग से कोई इनाम अथवा सुविधा प्रदान होती है, साथ ही साथ उन्नति के समय यदि पक्षपातपूर्ण नीति अपनाई जाती है, तो इसमें दूसरे कामगारों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
6.       मीटिंग उपयोगी है पर काम जरूरी है:
जरूरत से ज्यादा मीटिंग करना कम्पनी की कमजोरी का प्रतीक है। लोग या तो मीटिंग कर सकते हैं या काम। अगर कंपनी के अधिकारी अपने सीमित समय से अधिक मीटिंग करने में बिताते हैं तो यह प्रबंधन की कमजोरी है। मीटिंग कभी-कभार ही होनी चाहिए। जिस कम्पनी में अधिकांश समय लोग मिलते-चुलते रहते हैं. वहाँ किसी का भी कोई काम पूरा नहीं हो पाता। अधिक मीटिंग का मतलब होता है कि एक विभाग या एक प्रणाली का काम बँट गया है, उसकी जिम्मेदारी कम हो गयी है और काम के बारे में जानकारी सही व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाई।
7.       तुम हमें कोल दो, हम तुम्हें मोल देंगे :
ऐसे तो मनुष्य की इच्छाएँ असीमित एवं मांग अनंत होती है, जोकि किसी प्रबंधन द्वारा पूरी नहीं की जा सकती है। लेकिन कोई भी प्रबंधन अपने औद्योगिक संघ को विश्वास में लेकर अपने कामगारों की कर्तव्य-निष्ठा के आधार पर उनकी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे रोटी, कपड़ा और मकान, स्वास्थ्य, परिवहन, शिक्षा, मनोरंजन, प्रशिक्षण एवं वर्तमान/भविष्य के प्रति सुरक्षा प्रदान करे तो प्रबंधन आसानी से उत्पादकता की पराकाष्ठा तक पहुँच सकता है।
8.       प्रथम पंक्ति के पर्यवेक्षकों पर विशेष ध्यान दें--
प्रसिद्ध भारतीय प्रबंधन सलाहकार श्री एस॰ रागनेकर के अनुसार प्रथम पंक्ति के पर्यवेक्षकों में 50 से 65-प्रतिशत दक्षता का आकलन किया जाता है, लेकिन दुख की बात है भारतीय प्रबंधन में उनकी कड़ी काफी कमजोर होनो की वजह से अपने आपको असहाय, शक्तिहीन, निराश, हताश एवं विवश अनुभव करते हैं। यही वजह हे कि टीम-भावना की कमी से उचित उत्पादन नहीं मिल पाता है।
आप केवल इतना ही काम करो, जितना मैं कहता हूँ ज्यादा नहीं। बाकी मैं देख लूंगा इससे पर्यवेक्षकों की आंतरिक इच्छा का दमन हो जाता है तथा कार्य करने का मिजाज ठंडा पड़ जाता है।
9.       टर्न-अराउंड पद्धति अपनाएँ
रिचार्ड एस॰ स्लोमा अपनी पुस्तक टर्न अराउंड मैनेजर हैंड बुक के माध्यम से लिखते हैं -- व्यक्ति ही किसी भी फर्म के लिये सबसे ज्यादा मूल्यावान वस्तु है। अगर आपके पास उत्तम श्रेणी का उत्पाद है, मगर मध्यम/निम्न श्रेणी के कामगार है तो वह उत्पाद शीघ्र ही मध्यम श्रेणी का हो जायेगा। अत: उत्पादन, उत्पादकता के अनुरूप कामगारों की श्रेणी का निर्धारण कर जनाधिक्य की पहचान करना एवं उन्हें उस कार्य से मुक्त कर देना चाहिए।
10.     दक्षता-प्रबंधन-
आर. ब्रश मैकफ़्फ़ी तथा विलियम प्रोफेनबर्गर के अनुसार,
दक्षता= प्रेरणा/योग्यता
      =वातावरण x नियंत्रण की दक्षता एवं प्रयास x पहले की योग्यता
ऐसे तो संसाधन कई प्रकार के होते हैं, जैसे कि मानव, धन, सामान एवं सूचना इत्यादि। लेकिन मानव शक्ति की दक्षता का आकलन करने में कई तत्व काम आते हैं जो इस प्रकार हैं-
प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता, मात्रा, वार्तालाप, ग्राहकों के प्रति झुकाव, खुलापन, बातचीत, विश्वसनीयता, सहयोग, प्रयोग, त्वरित कार्यवाही आदि।
इस संदर्भ में हमारी कंपनी ने अधिकारी-मूल्याकंन-प्रतिवेदन का प्रारूप तैयार किया है तथा यह कई अनुषंगी ईकाईयों में लागू हो चुका है। यही नहीं, हमें अपनी महिला कामगारों को सुचारु रूप से काम लेने की योजना भी बनानी चाहिए, क्योंकि लगभग 50000-महिलाएँ कार्य करती हैं। उनमें से काफी महिलायें आधिक्य की अनुसूची में हैं, जिन्हें पंखा खलासी, पम्प खलासी, वाहन-चालक, सुरक्षा प्रहरी, अस्पताल आदि कार्य में लगाना चाहिए। अन्यथा बोझ बनाने से बेहतर है कि उन्हें स्वैच्छिक सेवा-निवृति प्रदान की जाए।
11.     तकनीकी प्रबंधन पर ध्यान दें-
आज कंप्यूटर का जमाना है। सभी अधिकारियों को उनकी जानकारी दें तथा से अद्यतन करते रहें। यही नहीं, भूमिगत खदानों तथा कोयले की यांत्रिक लोडिंग में नवीन तकनीकी का इस्तेमाल होना चालू हुआ है, वहीं खुली खदानों में भारी मृदा संचालन मशीनरी का उपयोग होना प्रारंभ हुआ है। अत: उनके अनुरूप मानव संसाधन का पुनर्गठन एवं चयन करें ताकि उत्पादकता पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़ सके। यही नहीं, नवीन-विचारों को समर्थन दें, जैसे कि अपने स्वयं का कोयले पर आधारित बिजली-घर बनाकर खुद की खदानों में उपयोग में लें।
12.     खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन-
जैसा कि कहा गया है कि एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है और शरीर को स्वस्थ रखने के लिये संतुलित आहार-विहार एवं नित्य व्यायाम, योग इत्यादि की जरूरत होती है। यद्यपि इन्हीं चीजों के प्रयोजन के लिये अंतर-इकाई, अंतर क्षेत्रीय एवं अंतर-कम्पनी स्तर पर खेलकूद का आयोजन किया जाता है। लेकिन खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने में विशेष रुचि नहीं ली जाती है। यही नहीं, रेसक्यू एवं अन्य कार्यालयों में भी जिम की भी सुविधा मुहैया करवायी जाए।
13.     पार्टी एवं पिकनिक का आयोजन-
मासिक तौर पर एक पार्टी एवं छ: माह में एक बार पिकनिक का आयोजन होना चाहिए ताकि व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे के नजदीक आएँ एवं पारस्परिक सद्भावना, सम्मान एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण हो सके तथा वही तरोताजा टीम उत्पादन के स्तर को छूने में जान फूँक देगी।
14.     विकेन्द्रीकरण एवं मुनाफा-
इतिहास गवाह है कि विकेन्द्रीकरण कितना आवश्यक है। एक युद्ध के दौरान वरिष्ठ अधिकारी ने कही दूर बैठे ही अपनी सेना को कूच करने का आदेश दिया। उसे युद्ध-स्थल के हालात की जानकारी नहीं थी और उसका निर्णय गलत साबित हुआ। अगर वह कूच का निर्णय वहीं मौजूद अधिकारी पर छोड़ देता तो अनेक सिपाहियों की जान बच सकती थी।
कुछ फैसले औरों पर भी छोड़ना जरूरी होता है इसमें लोग आपके भरोसे का मान रखने की कोशिश भी करेंगे।
15.      सलाह-मशविरा जरूरी है-
मुझे इस प्रस्ताव में कोई रुचि नहीं है क्योंकि मैं निश्चित रूप में कह सकता हूँ, शायद ही इस पर विचार किया जायेगा।
वह सारा समय लोगों को निर्देश देता है पर इसमें अपने सहकर्मियों की राय नहीं लेता। यह एक दिन उसके लिये मुसीबत का कारण बनेगा। अगर आप चाहते हैं कि आपके निर्देशन का पालन सही हो तो इसके बारे में उन लोगों से चर्चा जरूर करें जिन्हें यह काम करना है। यूरोप का महान नेता नेपोलियन भी अपने जनरलों से राय लेता था।
16.      सभी की प्रतिभा पर ध्यान दें-
बहुत अधिक प्रतिभा वाले लोगों पर तो सभी का ध्यान जाता है। समझने वाली बात यह है कि हर साधारण व्यक्ति में कोई न कोई सृजनात्मक प्रतिभा छिपा रहती है। अधिक प्रतिभाशाली लोगों के साथ-साथ इनके कौशल को निखारना तथा प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। मान लीजिये यदि आप एक अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति के कौशल को 15-प्रतिशत निखारने का प्रयास करेंगे तो नतीजा अच्छा ही होगा। पर अगर आप 400 लोगों की प्रतिभा में एक प्रतिशत सुधार भी पायें तो उसके लाभ कहीं ज्यादा बड़े होगें।
17.     अपने समय को नियोजित करें-
हर सुपरवाईजर को रोज कुछ मिनट अलग निकालने चाहिए- केवल सोचने के लिये। हम में से अधिकतर लोग बिना सोचे-समझे ही यहाँ-वहाँ भागते रहते हैं और जैसे-जैसे कोई काम सामने आता जाता है उसे करते जाते हैं। पर अगर हम दिन में कुछ मिनट अलग निकालकर अपने समय को थोड़ा-सा नियोजित कर लें तो हम ज्यादा अच्छा काम कर पाएँगे।
18.     सभी ओर ध्यान दें-
जब कोई मैनेजर पूरी कम्पनी का प्रमुख अधिकारी बन जाता है तो उसके केवल अपने पुराने विभाग पर ध्यान देने की जगह पूरी कम्पनी के बारे में सोचने की आदत डाल लेनी चाहिए। वरना पूरी कम्पनी पर तो इसका असर पड़ेगा ही साथ ही उस विभाग का नया मैनेजर भी अपना काम ठीक से नहीं कर पायेगा। बॉंस को भूलना पड़ेगा कि वह कभी केवल एक विभाग और एक ही तरह के काम जुड़ा हुआ था।
19.     सृजनात्मकता को बढ़ावा दें-
हमारी कमपनी में सृजनात्मकता को बढ़ावा नहीं दिया जाता है जबकि इसे सुचारु रूप से बढ़ावा देने की सख्त आवश्यकता है।
अधिकारी एवं कामगारों का मनोबल उँचा रखने के लिये उन्हें मैन ऑफ मंथ, मैन ऑफ कम्पनी इत्यादि सम्मानों से नवाजा जाय तथा ज्यादा से ज्यादा लक्ष्यों के लिये प्रेरित किया जाय।
20.     प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दें-
हेनरी फार्ड ने कहा था कि जितनी भी मशीनरी, धन तथा कारखाने मेरे पास है, आप सब ले जाओ, केवल मेरे आदमियों को छोड़ दो, मैं पुन: औद्योगिक घराना खड़ा कर दूँगा।
रोबिन के अनुसार दक्ष आदमी हमेशा दक्ष नहीं रहता। उसकी कुशलता खराब होती जाती है। यहाँ तक कि हमेशा के लिये खत्म हो जाती है। यही कारण है बड़े-बड़े औद्योगिक घराने अपने आदमियों की औपचारिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं। हमारे उपक्रम में प्रशिक्षण को काफी बढ़ावा दिया जाता है लेकिन अधिकारियों एवं कामगारों को खुले मन से प्रशिक्षण के लिये छोड़ा नहीं जाता है। अत: यह प्रशिक्षण जैसा महत्वपूर्ण कार्य सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।
21.     मानव संसाधन की विचारधारा में बदलाव को स्वीकृति दें-
बदलते परिवेश में श्रमिक कानून में भी काफी बदलाव आया है। परम्परागत औद्योगिक संबंध बदला है। तकनीकी विकास ने कागजी कार्य को समाप्त कर दिया है तथा कल्याणकारी कार्य की जरूरत कम हो रही है क्योंकि कामगार एवं अधिकारी-गण स्वयं सचेत हो चुके हैं।
अत: अब हमें इस बदलाव को अंगीकीर करते हुए जमाने के हिसाब से बढ़ती आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि हमारा मानव संसाधन पुरातन न होकर नये जमाने के साथ कदम ताल मिला सके।
22.     अधिकारियों एवं कामगारों की अभिरुचियाँ बढ़ाएँ-
प्रत्येक व्यक्ति की कुछ निजी इच्छाएँ होती है, कुछ शौक होते हैं। ये इच्छाएँ और शौक भी सदैव संघर्ष के लिये प्रेरित करते हैं। ज्ञान और अनुभव के साथ-साथ ये अभिरुचियाँ बढ़ती है, उनमें निखार आता है और प्रोत्साहन पाकर ही ये अभिरुचियाँ कला का रूप लेने लगती है। ये अभिरुचियाँ कई प्रकार की हो सकती है शारीरिक क्रिया संबंधी, बौद्धिक विकास संबंधी, कला और शिल्प संबंधी। अभिरुचियों की यह विशेषता होती है कि उन पर व्यक्ति को विशेष खर्च नहीं करना पड़ता। अत: हमें अपने अधिकारियों, कामगारों, उनकी महिलाओं तथा बच्चों  लिये विभिन्न अभिरुचि केन्द्रों(मनोरंजन केन्द्रों) की स्थापना करनी चाहिए। जैसे कि गीत-गायन, संगीत, नृत्य, अभिनय, वाद्य-संगीत, लोक-गीतों का गायन, लोक-संस्कृतियों का संकलन, वेश-भूषा, कविता-लेखन, भाषाओं का ज्ञान, लेख, पत्रकारिता, पोस्टर बनाना, कार्टून बनाना, टाईपिंग, खेलकूद, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, चित्रकारी, ग्रीटिंग-कार्ड बनाना, इत्यदि बच्चों तथा किशोरों को अच्छे लगते हैं, जबकि गुड़िया बनाना, फैशन डिजाईनिंग, बालों का शृंगार, मेहेंदी सजाना, पाक-कला, गृह-सज्जा, गार्डनिंग, किचन-गार्डन इत्यादि लड़कियाँ के कैरियर विकसित करने में मदद कर सकते हैं। जैसा कि एयर-फोर्स में महिलाएँ स्वैच्छिक सिलाई बुनाई केन्द्रसंचालित करती है तथा अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त करती है।
23.     अन्य औद्योगिक संस्थाओं से जुड़ें -
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसकी सभी क्रियाओं का केन्द्र समाज होता है। वह अपनी क्रियाओं, व्यवहारों और विचारों से दूसरों को प्रभावित करता है। वह स्वयं भी दूसरों को इन्हीं क्रियाओं और व्यवहार से प्रेरणा, सहयोग ओर सहायता लेकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ करता है। औद्योगिक जीवन में कई ऐसी संस्थायें हैं जिनसे जुड़ने पर हम अपने उपक्रम की तुलना कर इसे विकास के पथ की ओर अग्रसर करने में मदद कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यपारिक मेले में अंश-ग्रहण कर हमें विभिन्न संस्थानों से अपना सीधा सम्पर्क स्थापित कर उनसे अपनी कमजोरियों का आकलन कर उन्हें मिटा सकते हैं तथा साथ ही साथ अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन भी कर सकते हैं। अत: हमें अपने अधिकारियों तथा कामगारों को देश की श्रेष्ठ संस्थाओं जैसे आईआईएम, एनआईपीएम, एमएमजीआई इत्यादि से अधिक जुड़ने की प्रेरणा देनी चाहिए।
24.     पुस्तकालयों एवं वाचनालयों का निर्माण करें-
पुस्तकों की उपयोगिता, महत्व और सार्थकता के बारे में कुछ ऐसे विचार और सुक्तियाँ हैं, जो हमारे सामाजिक जीवन में सर्वत्र पढ़ने, देखने, सुनने और मनन के लिये होती है। चूँकि समस्त ज्ञान का स्रोत पुस्तकें ही है, इसलिए इनकी महत्ता को किसी स्तर पर नकारा नहीं जा सकता। इसलिए हमें अपने अधिकारियों, कामगारों तथा उनके बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य-निर्माण के लिये प्रारंभ से ही उन्हें पुस्तकों से जोड़ना चाहिए ताकि वे न केवल तकनीकी बल्कि साहित्यिक, कला, राजनीतिक, दार्शनिक तथा आध्यात्मिक जीवन आदि के अनुपम दृष्टांतों की जानकारी प्राप्त कर सकें। वास्तव में पुस्तकों ने लोगों के जीवन में अनेक सामाजिक परवर्तन किए हैं, इसलिये कहा जाता है कि जो काम तोप, तलवार और बंदूक से संभव नहीं हो सकता, वह काम पुस्तकों के माध्यम से सरलता से हो जाता है। अत: हमारे उपक्रम में कल्याण मंडप की भांति ही केन्द्रीय पुस्तकालय एवं वाचनालय की स्थापना होनी चाहिए जो हमारे मानव संसाधन को असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योर्तिगमय के पथ पर ले जा सके।
25.     दुर्व्यसन मुक्ति केन्द्रों की स्थापना करें-
एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताविक औद्योगिक जगत में लगभग 80-प्रतिशत अधिकारी एवं कामगार किसी न किसी प्रकार से धूम्रपान अथना मादक पदार्थों के सेवन से ग्रसित है और दुर्व्यसनों का तेजी से बढ़ता यह प्रचलन उनके बच्चों के चरित्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। नशा चाहे किसी भी रूप में हो उसका शरीर और बुद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नशे से विवेक कुंठित होता है, परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होती है, परिवार की खुशहाली पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है और दाम्पत्य संबंधों में तनाव लाकर परिवार को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर देता है। दुर्व्यसनों के कारण उन्हें हर स्तर पर उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान और वितृष्णा का सामना करना पड़ता है। उत्साह-हीनता उसकी सोच को इतना पंगु बना देती है कि वह जीवन भर निष्क्रिय, निठल्ला और निकम्मा बना रहता है। परिवार के अन्य सदस्य भी उसे उपेक्षित करने लगते हैं।
इस प्रकार एक अच्छा मानव संसाधन बर्बादी के कगार पर पहुँच जाता है। अत: उसकी सुरक्षा एवं स्तर को ऊपर उठाने के लिये दुर्व्यसन मुक्ति केन्द्र की स्थापना करनी चाहिए। जिस प्रकार से एक सामाजिक कार्यकर्ता ने जोधपुर में अफीम मुक्ति केन्द्र की स्थापना करके लाखों नौजवानों को बर्बाद होने से बचाया, ठीक उसी प्रकार हमें भी मानव शक्ति इस प्रकार के राक्षसों से निजात दिलानी चाहिए।
26.     व्यापार एवं सूचना संबंधी कानून की जानकारी दी जाय -
आधुनिक युग में कोई भी व्यवसाय तभी पूर्ण सफल माना जा सकता है जब उसमें व्यापार जगत की सभी तकनीकियों के साथ उससे संबंधित कानून की जानकारी हो, ताकि कोई भी निर्णय उपक्रम को कानूनी तौर पर सुरक्षित रख सके। यही नहीं, सार्वजनिक उपक्रम की सूचनाएँ कई लोगों की जरूरत बन जाती है। अत: किसी भी ऐसी सूचना का प्रसारण न हो जोकि उपक्रम के भविष्य को अंधकार के गर्त में ढकेल दे। अत: सूचना का अधिकार अधिनियम,2005, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधी कानून, बैकिंग, वित्त इत्यादि की जानकारी भी हमारे मानव संसाधन को होना जरूरी है।
27.     ग्राहकों को महत्व दें -
एक संतुष्ट ग्राहक कम्पनी के लिये एक मूल्यवान वस्तु है जबकि एक असंतुष्ट ग्राहक हमारी बुराईयों का प्रचारक है। कोई भी बुरी खबर, अच्छी खबर की तुलना में अत्यंत तीव्रगति से फैलती है। हमारी कम्पनी में एक ग्राहक की मूलभूत आवश्यकता, गुणवत्ता, कोयले का आकार, सही वजन, कम पैनल तथा कार्यालयीन कार्य की गति इत्यादि है। ग्राहकों की शिकायतों का समाधान शांतिपूर्वक करना चाहिए। अगर ग्राहक को संतोषजनक सेवा नहीं मिलेगी तो उसका परिणाम सभी को भुगतान पड़ेगा। व्यवसाय ठप्प हो जायेगा और सब पर इसका असर होगा। ताज्जुब की बात यह है कि लोग प्राय: इस बात को भूल जाते हैं कि वे विभागों की आपसी प्रतिस्पर्धाओं तथा अन्य लोगों पर दोषारोपण करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि इससे पूरे कारोबार पर बुरा असर पड़ रहा है। यह महत्वपूर्ण नहीं कि कौन गलत है और कौन सही।
28.     भू-विस्थापितों की सुविधाओं पर ध्यान दें -
हमारे मानव संसाधन का अधिकांश वर्ग आदिवासी तथा जंगलों में रहने वाले किसानों का है। चूँकि उनकी जमीन के नीचे कोयला छुपा है, अत: उनकी भूमि-अधिग्रहण कर हम अन्य जगह पर उन्हें विस्थापित करते हैं। अगर रिहेबिलिशन योजना के तहत उन्हें पूर्ण सुविधा एवं सुरक्षा के साथ रखा जाता है तो उनके मन में कम्पनी के प्रति आभार-भाव प्रकट होगा एवं कम्पनी के कार्यों के लिये सतत प्रयत्नशील रहेंगे और अगर वे असंतुष्ट रहते हैं तो हमारे कई कार्यों में या तो बाधा डालेंगे अन्यथा किसी विवाद को जन्म देंगे। अत: कानून के तहत, जो हो सके, उन्हें अपना हक प्रदान कर न केवल हम अपने लक्ष्य हासिल कर सकते हैं वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक लोक-कल्याणकारी कार्य करते हुए एक सराहनीय कदम उठा सकते हैं। इससे हमारे उपक्रम का गौरव सुशोभित होने लगेगा।
29.     अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखें -
हमारी खनन संक्रियायें वातावरण में कई प्रकार के प्रदूषण पैदा करती है जैसे जल, वायु, भूमि तथा ध्वनि प्रदूषण। प्रदूषण से प्रदूषित होने लगते हैं हमारे सभी चल और अचल संसाधन। जिसकी वजह से हमारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है तथा कार्यदक्षता को काफी निम्न स्तर तक प्रभावित करता है। हमारी कार्य-दक्षता एवं कार्यक्षमता में सुधार लाने के लिये हमें अपने परिवारों में पर्यावरण शिक्षा पर विशेष बल देना चाहिए तथा उसकी सुरक्षा के प्रति संकल्प लेना चाहिए तथा जो पर्यावरण प्रबंधन योजना बनायी जाती है उसे भी अपने कार्य का अभिन्न अंग मानकर पूरा करना चाहिए, न कि कोई थोपा हुआ कार्य समझकर।
30.     विरोधाभास की स्थिति में सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें -
मैनेजर और उसके सह-कर्मियों के बीच किसी भी विरोध की स्थिति में ऐसा हल खोजना चाहिए जिससे दोनों पक्षों की सहायता हो और कम्पनी को भी लाभ हो। मैनेजर आम तौर पर जो गलती करते हैं वह स्वयं को सहकर्मियों से श्रेष्ठ समझने की होती है। वे अपने सहकर्मियों के दृष्टिकोण और उनके विचारों की सराहना करने के साथ-साथ उनकी इच्छाओं, समस्याओं और उनके भयों को समझने का भी प्रयास नहीं करते। अगर आप मशीनों की तरह व्यवहार करेंगे तो वे भी मशीन जैसे ही बने रहेंगे। वे निश्चित कार्य से अधिक या उससे बेहतर कुछ नहीं करेंगे।
किसी भी औद्योगिक इकाई में धन, मशीनों और माल का बहुत महत्व होता है। पर याद रखें, मैनेजर का उद्देश्य केवल उसके साथ काम कर रहे कर्मचारियों के माध्यम से ही पूरा होता है। इसलिये हम कहते हैं कि लोगों से उनकी आदतों, उनके ज्ञान उनके स्वभाव के अनुसार व्यवहार करना मैनेजर का एक महत्वपूर्ण दायित्व है।
31.     मानवीय समीकरण को महत्व दें-
विश्व के 20-देशों की कई उद्योग-संस्थाओं में किये गये शोध एवं सर्वेक्षण के आधार पर जेफ्री वेफर ने अपनी प्रबंध पुस्तक ह्यूमन इक्वेशन में लिखा है कि उपक्रमों की सफलता का राज मानव संसाधन आधारित नीतियाँ हैं जो उन्हें रोजगार की सुरक्षा मुहैया करा सके, जो उनके सोचने के नवीन दृष्टिकोण को पैदा कर सके। जो अधिकारी एवं कामगारों के बीच वेशभूषा, भाषा, वेतन आदि के अंतर की खाई को पाट सके एवं जो कम्पनी अपनी आर्थिक, वित्तीय तथा दक्षता के पैमाने को सभी में पूर्णतया वितरित कर सकें।
आप अपना काम करो, क्योंकि आप अपना काम करने में स्वतंत्र हैं, तब आप हर समय सही काम करोगे।
इस स्व-अनुशासित मानव संसाधन का यह खजाना अपने आप में बेशकीमती बन जाता है।
32.     सेफ़्टी मैनेजमेंट प्लान को निरूपित करें-
हमारे उपक्रम में सभी कार्य अनेक जोखिम भरे हैं, जैसे कि भूमिगत खानों में अचानक गैस का रिसाव हो जाना, गैस-विस्फोट हो जाना अथवा आग लग जाना इत्यादि-इत्यादि। ठीक उसी प्रकार खुली खदानों में कई प्रकार की दुर्घटनायें आपदा का जन्म दे सकती है। इस अवस्था में मुख्यतया शिकार हमारे लोग, हमारी मशीनरी होती है। अत: उनकी सुरक्षा के पूर्ववती उपायों को खोजकर सेफ़्टी मैनेजमेंट प्लान का निर्माण करना चाहिए। जिसके तहत हम उस दुर्घटना एवं हृदय विदारक घटनाओं को होने से बचा सकें और अगर कोई हो भी जाती है तो तुरंत नियंत्रण में लाकर आगे होने वाली जन-धन की क्षति को रोका जा सकता है। अत: हमारी कम्पनी में खनन कार्यों के अलावा प्राकृतिक विपदाओं जैसे सुनामी, भूकंप, साइक्लोन, बाढ़ इत्यादि विषम परिस्थिति से निपटने की योजना की रूपरेखा भी तैयार रखनी चाहिए।
33.     स्फूर्त-टीम (दल) का निर्माण करें-
हिटलर के सत्ता में आने से पूर्व जर्मनी का मनोबल गिरा हुआ था तथा जर्मनी अपने आपको दुखी तथा हताश अनुभव कर रहा था। हिटलर के दल निर्माण के गुणों की वजह से वह जर्मनी के लिये प्रेरणा का स्रोत बन गया तथा जर्मन का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करवा दिया।
अत: प्रभावी दलों के निर्माण से हम अपने लक्ष्य निर्धारण एवं उसे सफलतापूर्वक हासिल करने में  कामयाब सिद्ध हो सकते हैं।
केरॉल ए. बीटी एवं बेन्द्रा ए. बार्कर स्कॉट अपनी पुस्तक बिल्डिंग स्मार्ट टीम में लिखते हैं कि प्रभावी दल का निर्माण आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है तथा इसे अवश्य अमल में लाना चाहिए।
34.     तनाव-प्रबंधन पर विशेष ध्यान दें-
आधुनिक जमाने में हर कोई किसी न किसी तनाव से ग्रस्त नजर आता है। नतीजन वह किसी मानसिक बीमारी, मनो-व्याधि अथवा अवसाद सिजोफ्रेनिया का शिकार हो जाता है। इस प्रकार से हमारा स्वस्थ मानव संसाधन बीमार होकर रक्तचाप, मधुमेह, हृदय-रोग तथा चिड़चिड़ापन आदि व्याधियों में ग्रस्त हो जाता है।
डॉ विनय जोसी स्ट्रेस फ्रॉम बर्न आउट टू बैलेंस में बताते हे कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में कई बातें छुपी है जो हमें ध्यानावस्था तथा तनाव-मुक्त अवस्था में ले जाकर इन बीमारियों को पास में फटकने भी नहीं देती है तथा अच्छे निर्णय देने की शक्ति का निर्माण करती है। सत्संग समारोह का भी बीच-बीच में आयोजन होते रहना चाहिए।

उपसंहार-
इतिहास विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। इसमें किसी भी बात का संदेह नहीं है कि मशीनों के पीछे इंसान ही वास्तव में इस प्रतिष्ठान का प्राण रहा है।
बदलती आर्थिक अवस्थाओं में उत्पन्न झंझावात, ग्राहकों तथा प्रतिस्पर्धा के सचेतन में निरंतर उपक्रमों का बदलना, सामाजिक धरातल, कार्यस्थल पर पारिवारिक मूल्यों में परिवर्तन का होना श्रमिक शक्ति का वैश्वीकरण तथा बदलते पहलुओं पर ध्यान इत्यादि ऐसे कई कारण हैं जिस पर अगर विचार न किया जाये तो कोई भी व्यवसायिक प्रतिष्ठान को ताला लगते देर नहीं लग सकती है। यही कारण है कि मानव संसाधन को काफी सहज कर निर्मित किया जाता है।
किसी भी उपक्रम में ज्ञान का स्रोत मनुष्य हे जो ज्ञान के माध्यम से कार्य संपादित करता है एवं दूसरे व्यक्ति को संप्रसारित भी करता है अत: ज्ञान का निरंतर अद्यतन होना जरूरी है ताकि उसमें नवीन विचारों का समावेश हो सके और साथ ही साथ सकरात्मक सृजनशीलता को बढ़ाया जा सके।
अत: उपरोक्त सुझावों के माध्यम में हम अपने भीतर एक संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन" का आविष्कार कर अपने लक्ष्य को हासिल करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकते हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मानदंडों पर भी खड़े उतर सकते हैं।


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